शनिवार, 21 मार्च 2020

बचपन

तितलियों के संग अठखेलियाँ करते,
फ़ूलों का झूला झूलते,
गम, मुसीबतों, चिंताओं से दूर
रहता है एक बचपन।

किलकारियों से भरी शरारत,
नटखट चेहरे की मासूमियत,
बातों में लड़कपन की तुतलाहट,
बरबस किसी को आकर्षित कर लेता है बचपन।

न किसी धर्म न किसी जात से वास्ता इसका,
न सांसारिक लोभ में डूबकर यह सिसकता,
फ़िर भी प्रेम की अमृत की
वर्षा करता है बचपन।

ज़िंदगी की भीड़ से दूर,
मजबूरियों तनावों से हो कर मुक्त
हर इंसान के जीवन में
आता है यह बचपन।

बचपन की निश्छल यादों को
भूल जाता है इंसान,
लम्हों के बीतते दौर में
कहीं खो जाता है बचपन। 

शुक्रवार, 20 मार्च 2020

हमारे सपने

मनुष्य के जीवन में कई उतार चढ़ाव आते ही रहते हैं। लेकिन तमाम मुश्किलों के बावजूद उसे अपने जीवन की बाधाओं से जूझने की प्रेरणा देते हैं उसके सपने। सपने, जो कभी सच होते हैं तो कभी हमारे मन के एक कोने में दब कर रह जाते हैं। इन्हीं सपनों पर आधारित है मेरी यह कविता ‘हमारे सपने’—

बंद आँखें न जाने कितने सपने बुनती है,
हकीकत से दूर अपनी दुनिया को बसाती है।

सपना जो हर पल सबकी आँखों में सजता है,
झूठी आशाएँ जगाकर पल भर में विलुप्त हो जाता है।

ख्वाबों की दुनिया बड़ी हसीन होती है,
कभी आसमाँ के तारे तोड़ लाती है,
कभी स्वर्ग की खुशियाँ चुरा लाती है।

वादियों में उठता वो सफेद धुआँ,
सतरंगी रंगों से सजा समाँ,
खुशियों के सरगम की तान छेड़ती ज़िंदगी,
दूर तक साथ चलता एक साथी ,
मंज़िलों की पहुँच,
न जाने और कितनी ही तस्वीरें,
जिन्हें रंग जाती है सपने।

सपने जो यथार्थ की धरा पर नहीं बनते,
इंसान को कुछ पल का सुख देते, पर अपने नहीं बनते।

ज़रा सी आहट पर आँखें खुल जाती हैं
और सपना वहीं टूट जाता है।

ज़िंदगी की सच्चाई फ़िर सामने होती है,
और सपनों का घरौंदा बिखर जाता है।

सपने केवल सपने होते हैं,
 दिखते हैं और फ़िर टूट जाते हैं।

मगर इन टूटे सपनों से एक नया स्वप्न जन्म लेता है,
और पंखों को उड़ान देता है।